सिद्ध मंत्र व हवन

हुता देवी विषेशेण, सर्वकामप्रदायिनी । सर्वपापक्षयरी वरदा भक्तवत्सला ।।12।19।।

यदि गायत्री मंत्र के उच्चारण के साथ अग्नि में आहुतियॉं भी दी जाएॅ तो मनुष्य के सब पापों को नष्ट करके माता गायत्री होता (साधक)के समस्त मनोरथों को पूरा करती है ।

शान्तिकामस्तु जुहुयात् सावित्रीमक्षतै: शुचि: । हन्तुकामो पमृत्युं च घृतेन जुहुयात् तथा ।।12।20ंंं।।
श्रीकामस्तु तथा पद्मैर्बिल्वै: कांचनकामुक:। व्र्चस्कामस्तु प्यसा गायत्रीं जुहुयात्तथा ।ं12।21।।

यदि गायत्री मंत्र उच्चारण पूर्वक अक्षत् (लाजा एवं खील) से आहुति दी जाय तो शान्ति प्राप्त होती है । घृत से आहुति देने से अल्पमृत्यु दूर हो जाती है । पद्म, बिल्व(बेल) तथा दूध से आहुति देने से यथाक्रम तेजस्विता, ओज, वीर्य, और पराक्रम की वृद्धि होती है ।

घृतप्लुर्तस्तिलैव‍रौ, जुहुयात् सुसमाहित: । गायत्र्ययुतहोमाच्च, सर्वपापै: प्रमुच्यते ।। पापात्मा लक्षहोमेन, पातकेभय: प्रमुच्यते । अभीष्टलोकमाप्नोति, प्राप्नुयात् काममीप्सितम् ।।

घृतमिश्रित तिलों से जितेन्द्रिय होकर यदि एक होता, दस हजार आहुतियॉ दे तो वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और एक लाख आहुतियॉं देने से तो वह सारी भावनाओं से रहित होकर अभीष्ट लोक को तथा अभीष्ट पदार्थो को प्राप्त कर लेता है । साधक को चाहिये कि प्रतिदिन जप के उपरान्त जितना जप हो, उतना या दशांश होम करे । आहुति देते समय केवल ‘‘तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि धियोयान: प्रचोदयात्‘‘ पढ ़कर स्वाहाकार करे । ऐसा करने से पूर्णफल प्राप्त होता है और समस्त कष्टों का निवारण होता हे । यज्ञ का विज्ञान की सहायता से अपनी इच्छानुसार वर्शा कराई जा सकती है । यज्ञ से सन्तान होती है भयंकर रोग चला जाता है । इच्छानुकूल मनोकामनाएॅ पूर्ण होती हैं। ऋग्वेद के प्रथम मंत्र में अग्नि को देवताओं को बुलाने वाला दूत कहा है । सूर्य, चंद्र, वायु, जल, मेघ सभी देवताओं को बुलाने वाला अग्निदेव ही है । यज्ञ से सभी देवता प्रसन्न होते हैं । महर्षि याज्ञवल्क्य ने कहा है कि यज्ञ में जो आहुति दी जाती है उसके दो रुप बन जाते है । एक रुप तो जिस देव के लिये आहुति दी जाती है उसे मिल जाता है और दूसरा रुप मनुश्य के षरीर में प्रवेष करके उसे सन्मार्ग पर लाकर बैकुण्ठ पहुंचा देता है । गायत्री मन्त्र के अन्य प्रयोग तथा हवन मानव का जीवन विभिन्न समस्याओं से ग्रस्त रहता है । कोई धनाभाव से, कोई शरीर कष्ट से, कोई पारिवारिक कष्ट से तो कोई अन्य प्रकार से दु:खी होता है । परन्तु गायत्री मन्त्र ऐसा सर्वश्रेष्ठ मन्त्र है जिससे सब कुछ सि़द्ध हो सकता है । गायत्री सब प्रकार की इच्छाओं को पूर्ण करने वाली है । अत: लक्ष्य विशेष की प्राप्ति हुतु भिन्न–भिन्न बीज मन्त्रों का संपुट लगाकर जप करने से विशेष शक्ति उत्पन्न होती है और शीघ्र ही सिद्धि मिलती है । विश्वामित्र कृत गायत्री स्तवराज आदि ग्रन्थों में इनका वर्णन प्राप्त होता है । साथ ही अनेक सिद्ध महात्माओं ने कुछ प्रयोग साधकों के हितार्थ बतलाए है । अपनी विशिश्ट समस्याओं के निराकरण व सिद्धि के लिये इनका अनुभव किया जाना सर्वथा युक्त होगा । ऊँ भूभु‍र्व: स्व: इन व्याहृतियों के बाद गायत्री के आदि अंत में बीज मन्त्रों का उच्चारण संपुट कहलाता है । निम्न संपुट मंत्रों का प्रयोग सम्मुख दिखाई गई फल प्राप्ति में सहायक होता है:–

  1. ऊँ श्रीं हृीं श्रीं – सम्पुट को लगाने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है ।
  2. ऊँ ऐं क्लीं सौ: – इस सम्पुट के प्रयोग से वाक् सिद्धि होती है ।
  3. ऊँ श्रीं हृी क्लीं– इस सम्पुट के प्रयोग से संतान प्राप्ति, वषीकरण और मोहन होता है।
  4. ऊँ ऐं हृी क्लीं – इस संपुट के प्रयोग से शत्रु उपद्रव, समस्त विघ्न बाधाएॅं एवं संकट दूर होकर भाग्योदय होता है ।
  5. ऊँ हृी – इस सम्पुट के प्रयोग से रोग नाश होकर सब प्रकार सब प्रकार के ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है ।
  6. ऊँ आँ हृीं क्लीं– इस सम्पुट के प्रयोग के पास के द्रव्य का रक्षण होकर उसकी वृद्धि होती है एवं इच्छित वस्तु की प्राप्ति होती है ।

गायत्री मंत्र का सम्पुट से जप करने के अतिरिक्त विशेष फल की प्राप्ति हेतु हवन का प्रयोग भी विभिन्न फलो को प्रदान करता है । नोट:– अधिक जानकारी के लिये आचार्य पंडित रामचन्द्र जी शास्त्री द्वारा लिखित एवं तपोभूमि द्वारा प्रकाशित गायत्री रहस्यदर्पण का स्वाध्याय एवं गायत्री चालीसा नित्यपाठ हेतु प्राप्त करे ।