आचार्य पं. बुद्धी प्रकाष शास्त्रीजी

अद्वितीय व्यक्तित्व के धनी पं. बुद्धी प्रकाष षास्त्री जी का जन्म पिता श्री षिवप्रसाद जोषी माता षंकुतला देवी के यहाँ दिनांक 20 अप्रैल 1969 को रात्री 10 बजकर 40 मिनट पर रोहिणी नक्षत्र में उज्जैन म.प्र. में हुआ। सामान्यत: षिषु जन्म अवधी 9 माह रहती है परंतु गुरुजी की जन्म अवधी 9 माह न होकर 13 महीने थी। अर्थात् गुरुजी ने 13 महीने मेें जन्म लिया। गुरुजी के जन्म से पूर्व ही पूज्य माताजी के साथ कई बड़ी विचित्र घटनायें घटित हुई।

पूज्य गूरुजी के अग्रज भ्राता पडित कुलदीपक जोषी भी नौ माह की बजाय 12 माह माता के गर्भ में रह कर जन्में थे वही पूज्य गूरुजी को गर्भ में स्थापित हुऐ 13 महीने होने से माताजी के परिवार वाले बहुत चिंतित थे तथा डॉक्टर भी बहुत अचंभित थे। माता श्री को डॉ. को दिखाने के पष्चात् डॉ. ने एक्सरे कराने को कहा परंतु उक्त समय एक्सरे की लाईट बहुत अधिक होने के कारण गर्भ में बच्चे की जान को खतरा था। डॉ. व परिजन के अंतिम निर्णय व आपरेषन की पूरी तैयारी एवं के कुछ क्षण पष्चात् ही माता श्री को बिना पीडा, तकलीफ, परेषानी के सुन्दर, तेजस्वी, ओजस्वी व बडी नेत्रों वाले बालक के रुप में गुरुजी का जन्म हुआ। षुरु से ही तेजस्वी, सुन्दर चेहरे व बडे नेत्रो के कारण हर कोई गुरुजी की प्रषंसा करता था। जिससे की आप को कई बार नज़र लग जाती थी।

गुरुजी बालअवस्था से 3 वर्श तक की उम्र में बोलने, चलने में सक्षम नहीं हुऐ थे। केवल आप माता–पिता के इषारे व उनको सुनकर ही कार्य कर पाते थे। इस अवस्था को देखकर गुरुजी के माता–पिता बहुत ही चिंतित थे। केवल परम् पूज्य श्री रामचन्द्र षास्त्रीजी (नाना गुरुवर) की भविश्य वाणी थी की यह बालक पिछले जन्म में मौन तपस्या के अनुश्ठान में रत था और मृत्यु पूर्व तीन वर्श का अनुश्ठान बाकी रह जाने की वजह से यह तीन वर्श पष्चात् ही दौड़ेगा, बोलेगा एवं इसकी वाणी भी बहुत आकर्शक रहेगी। जो कि जन्म के 3 वर्श बाद सच घटीत हुई। गुरुजी अपने माता–पिता के साथ बडोदा से सन् 1974 में फ्रीगंज उज्जैन क्षेत्र में सपरिवार सहित रहने लगे।

सन् 1980 से परम् पूज्य श्री रामचन्द्र जी षास्त्री के संसर्ग में सपरिवार रहने के साथ ही वेद कर्मकाण्ड ज्योतिश और आध्यात्मि क्षेत्र में ज्ञानार्जित करते हुए षिक्षा ग्रहण की और विक्रम विष्वविद्यालय से भी स्नातक डिग्री प्राप्त की। रामचन्द्र षास्त्री जी के पास पर्याप्त समय न होने के कारण गुरुजी ने पं. सोहन लाल जी पौराणिक से कर्मकाण्ड के साथ संगीत विद्या भी ग्रहण की। आपकी प्रखर बुद्धि होने से कम समय में ही कर्मकाण्ड व संगीत विद्या पूर्ण की। 2 वर्श में आपने पूर्ण कर्मकाण्ड, हारमोनियम, तबला आदि की षिक्षा ग्रहण की। इसी के साथ–साथ प्रकाण्ड विद्वान और श्री नारायण विजय पंचाग के लेखक श्री अमरचन्द्र जी त्रिपाठी से ज्योतिश की विद्या ग्रहण की। बालअवस्था से ही गुरुजी को किसी भी चीज को सीखने की बडी लगन थी। इस कारण आप विद्या अध्ययन के साथ–साथ मंदिर, घर व बाहरी कार्यो में भी परिपूर्ण थे। कम उम्र में षिक्षा ग्रहण के साथ ही आपने कर्मकाण्ड पंडिताई भी षुरु कर दी थी।

14 वर्श की आयु में सर्वप्रथम आपने एक ग्राम में भगवान सीता–राम की प्राण प्रतिश्ठा कराई। जिससे की प्रभावित होकर ग्राम वासियो ने गाँव में ही 50 बीगा जमीन, घर व मंदिर के साथ रहने का प्रस्ताव रखा परंतु गुरु आज्ञा न मिलने से आपने प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। सितंबर 1989 में परम् पूज्य श्री रामचन्द्र जी षास्त्री (नाना गुरुवर) का ब्रलोक गमन के पष्चात् उनकी धर्मपत्नी पूज्य पार्वती देवी द्वारा गुरुजी को दत्तक लिया जाकर पूजन, अभिशेक सहित परम् पूज्य रामचन्द्र षास्त्री जी कि गादी उनके द्वारा ग्रहण कराई गई। 20 वर्श की उम्र में गादी के पीठाधीष्वर बनने के पष्चात् से ही आप भी परम् पूज्य रामचन्द्र षास्त्री जी कि तरह उनकी कृपा से भक्तो की समस्याओे का समाधान, प्रष्नों के उत्तर व भक्तो के कश्टो का समाधान करते है। परम् पूज्य रामचन्द्र षास्त्री जी की तरह ही आप भी प्रतिदिन गायत्री मंत्र लिखते है एवं भक्तों को भी मंत्र लेखन के लिए प्रेरित करते है।

20 वर्श की उम्र में पीठाधीष्वर बनना एक बहुत ही चुनौती पूर्ण व कठिन कार्य होता है। जो कि आपने सहज ही इसे पूर्ण किया और आज आपके सान्धिय में बहुत से नये कार्यक्रम व सेवाए प्रदान की जाती है। जैसे– आपने गौषाला की षुरुआत एक गाय (जिसका नाम गायत्री रखा गया था) खरीद कर की एवं परम पूज्य रामचन्द्र षास्त्री जी की इच्छानुसार ब्राण बटुको के लिए नि:षुल्क त्रिपदा वैदिक विघा पीठ का आरम्भ किया। उन्ही की इच्छानुसार आप के द्वारा गौषाला व त्रिपदा वैदिक विद्यापीठ, जाग्रति विद्या पीठ, श्री गुरु मस्ताना व्यायाम षाला, आदि का निरंतर संचालन हो रहा है। आपके द्वारा आज भी सहज ही गायो की सेवा की जाती है। आप ही के द्वारा गाय को चारा डाला जाता है। यदि कोई गाय बीमार होती है तो आपके द्वारा ही उन्हें उपचार दिया जाता है। त्रिपदा वैदिक विद्यापीठ में आप ही के द्वारा ब्राण बटुको को कर्मकाण्ड व ज्योतिश की षिक्षा प्रदान की जाती है। नवरात्री में आपके द्वारा सभी मूर्तियों का आर्कशक श्रृंगार किया जाता है। नित्य गायत्री हवन किया जाता है। सन् 1998 में आपका विवाह होने के बाद आप पूरे परिवार के साथ रहते हुवे निरंतर सेवाए भक्तों की समस्याओं का समाधान निस्वार्थ भाव से किया जा रहा है।