गौशाला

नारायण नारायण गौ–सेवा आश्रम

क्यों पूज्यनीय है, भारत में गाय माता – किसी भी पशु–पक्षी का बच्चा जन्म लेते ही माँ नहीं पुकारता। यहां तक कि मनुष्य का बच्चा भी रोता, चिल्लाता है, परन्तु माँ शब्द का उच्चारण नहीं कर सकता।

– जब उसे सिखाया जाएगा तभी माँ कहना आरम्भ करेगा, परन्तु गाय का बच्चा पैदा होते ही माँ कहने लगता है और सच पूछिये तो सृष्टि के आदि में गाय से हमें माँ शब्द मिला। इस शब्द में जो स्नेह, रस आस्था एवं श्रृद्धा है, जबकि आधुनिक दौर के प्रचलित शब्द मम्मी, मम, मॉम आदि में नहीं है।

– जो स्नेह गाय के ने़त्रों से बरसता है व अन्य पशुओं में नहीं देखा जाता । आप गया पर हाथ फेरिए अनुभव करना, वह आपको कितना प्यार दुलार देगी।

– किसी पशु–पक्षी के मल को कोई नाम नहीं दिया केवल गाय के मल को ही गोबर नाम दिया। इसे भारतीय संस्कृति में अति पवित्र, शुद्धि करने वाला माना जाता है जिसमें लक्ष्मी वास करती है, ऐसे कीटनाशक, एन्टीसेप्टीक, एन्टीबॉयोटिक पदार्थ है।

– गोबर भूमि की उर्वरक शक्ति को बढाकर प्रदूषण को हरता है। गोबर से पुते घरों में सर्दी–गर्मी सन्तुलित रहती है और हानिकारक गैसों का प्रवेश नहीं हो पाता।

– किसी भी पशु–पक्षी को मनुष्य के साथ रिश्ते का नाम दिया गया। कोई भी चाचा, ताऊ, नाना अथवा ताई, चाची, नानी का रिश्ता नहीं जुडा, परन्तु ऋषियों ने गाय के साथ गऊमाता माँ का रिश्ता जोडकर नाम दिया।

– किसी भी पशु–पक्षी यहाँ तक कि मनुष्य के भी मूत्रदान का कहीं कोई जिक्र नहीं हैं परन्तु गोमूत्र का सर्वत्र वर्णन मिलता है। यहाँ तक कि असाध्य कैंसर रोग का भी इलाज गोमूत्र से सम्भव है।

– किसी भी पशु के दूध में स्वर्ण का अंश नहीं है, परन्तु गाय के दूध में स्वर्ण का अंश है।

– भैंस आदि के घी का कण आसानी से रक्त में नहीं घुलता और हृदय रोग की सम्भावना रहती है, परन्तु गाय का घी हृदय रोग को दूर करता है और अमृत के समान है। इसीलिये पूर्व काल में हृदय रोग का कोई अस्तित्व नहीं था।

– अन्य पशुओं को गन्दगी पसंद है, भैस कीचड में मस्त रहेगी अपने ही मल में धंसी रहेगी, परन्तु गाय सफाई पसन्द है। गाय के दूध मं जो भाईचारे का गुण है वह भैंस में नहीं है।

– गाय का दूध बुद्धि, स्मृति और सहनशीलता बढाने वाला है। बीस गायों को बांध कर उनके बच्चों को छोड दीजिए वे अपने माँ को पहचान कर उसके पास चले जायेंगे, परन्तु भैंस के दूध में इतनी शक्ति नहीं कि उसका बच्चा अपनी माँ को पहचान ले। भैंस यदि घर से बाहर छोड दी जाए तो वह अपने घर को भूल जाती है और कहीं की कहीं पहुँच जाती है परन्तु गाय को आप 5 कि.मी. दूर भी छोड आयेंगे तो वह अपने घर आ जाएगी, उसे इतनी पहचान हैै।

– भारतीय गाय कड़ी से कड़ी धूप और बफ‍र् जैसी ठंड को भी सहन कर लेती है परन्तु भैंस गर्मी में हाफ जाएगी और सहन नहीं कर पाएगी। इसलिए जो गुण जिसमें होते है, उसके भैंस के दूध में भी होते है।

– गाय रुखा–सूखा घास–पत्ति खाकर भी दूध दे देती है परन्तु भैंस अच्छी खुराक देने पर ही दूध देगी। भैंस का बच्चा मर जाये तो कपड़े का काला खिलौना रुप बच्चा बनाकर उसे दिखा दीजिए तो दूध दे देगी, उसे पहचान नहीं है परन्तु गाय का बच्चा मर जाये तो वह दूध नहीं देगी, उसे बहकाया नहीं जा सकता।

निष्कर्ष

– गाय में ऐसे बहुत सारे गुण है। जो अन्य पशुओं में नहीं है। अत: ये पशुओं में सर्वोपरि महत्वपूर्ण है। सभी को चाहिए कि इसकी रक्षा करें, लालन–पालन करें और इसकी नस्ल का सुधार करें। उपरोक्त गुण केवल भारतीय गायों में ही होते हैं, विदेशी नस्लों में नहीं। भारतीय गौवंश(गाय–बैल) में से सूर्यकेतु नाड़ी

– भारतीय गौवंश में सुर्यकेतु नाड़ी है, जो उसके गर्दन, कांधे व पीठ के पूरे हिस्से में पायी जाती है। इस सूर्य केतु नाड़ी में सूर्य तथा ब्रामाण्ड के ग्रहोें से औशधिय तत्व ग्रहण करने की क्षमता होती है। ठीक उसी तरह जैसे कोई तपस्वी एवं पहुंचे हुए ऋषि–मुनि अपनी योग साधना से अपने शरीर के सब चक्र खोलकर ब्राण्ड के ग्रहों से उनके औलोकिक तत्व ब्वेउपब मदमतहल खींच लेता है एवं फिर उनका शरीर ब्वेउपब मदमतहल से भर जाता है और फिर वो किसी के शरीर या बीमार पर हाथ रख देते है, या छू भर लेते है ता वह व्यक्ति ठीक हो जाता है।

ठीक वही औषधीय गुण गौ के रीढ ़ पर स्थित सूर्यकेतु नाड़ी ग्रहण करती है एवं फिर गौ दूध गौमूत्र एवं गोबर में से ब्वेउपब मदमतहल उतरती है एवं गौमूत्र में 35 एमीनो एसिड एवं विटामिन( जो स्वास्थ वर्धक होते जाते हैं) सबसे महत्वपूर्ण तत्व जो उसमें पाया जाता है वह है स्वर्ण । इसलिए भारतीय गौ– बैल का मूत्र औशधीय तत्व से भरा होता है। गाय के एक लीटर दूध में .02 मिलीग्राम शुद्ध स्वर्ण होता है। जिसका नित्य प्रयोग शरीर को बलिष्ठ और स्वर्ण के समान कांतिमय तैजस्वी और ऊर्जावान बनाता है।

श्रेष्ठ गौधन

सम्पूर्ण श्रृष्टि का सर्वश्रेष्ठ नस्लधारी गौधन केवल हिन्दुस्तान में ही है इसकी पहचान उसकी कुबड़ से होती है। बगैर कुबड़ वाली संकर गाये इन उपारोक्त गुणों से पूरी तरह वंचित है। योजना पूर्वक देशी नस्ल की गैयाओं को पूरी तरह से खत्म करने का शड़यंत्र देश में बडे़ पैमाने पर सरकार द्वारा प्रायोजित है। संकर गायों को प्रोत्साहन देने सेे मात्र 36 किस्म के देशी नस्ल वाली गैया ही अब बची है। जिनका संरक्षण अति आवश्यक है।