श्री गुरु–वंदना

गुरुब्र‍र गुरुवश्णुगु‍र्रुर्देवो महेष्वर:। गुरु: साक्षात् परं ब्र, तस्मै श्री गुरवे नम: ।। ध्यानमूलं गुरोमू‍र्त: पूजामूलं गुरो: पदम्। मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं, मोक्षमूलं गुरो: कृपा ।। चैतन्यं षाष्वतं षान्तं, व्योमातीतं निरंजनम्। नादबिन्दुकलातीतं, तस्मै श्रीगुरवे नम:।। अखण्डमण्डलाकारं, व्याप्तं येन चराचरम्। तत्पंद दषतं येन, तस्मै श्रीगुरवे नम: ।। अज्ञानतिमिरान्धस्य, ज्ञानाजनषलाकया। चक्षुरुन्मीलितं येन, तस्मै श्रीगुरवे नम:।। वन्दे बोधमयं नित्यं, गुरु षड्कररुपिणम्। यमाश्रितो हि वक्रोपि, चन्द्र: सर्वत्र वन्द्यते ।। श्री गुरु–वन्दना का अर्थ:– 1– गुरु ब्रा है, गुरु विश्णु है, गुरु महेष्वर (षिव) है और गुरु साक्षात् परब्र है– ऐसे श्री गुरु को नमस्कार। 2– गुरु की मूत ध्यान का कारण है, गुरु के चरण पूजा के कारण हैं, गुरु का वाक्य मन्त्र का करण है और गुरु की कृपा मोक्ष का कारण है। 3– चैतन्य–स्वरुप, षाष्वत, षान्त आकाष से परे, निरअंजन और नाद, बिन्दु तथा कला से परे (गुरु हैं)– उन श्री गुरु को नमस्कार।

4– अखण्ड मण्डल आकारवाले, चराचर को जिसने व्याप्त किया है– ऐसे स्थान को दिखानेवाले श्रीगुरु को नमस्कार। 5– अज्ञानरुपी मोतियाबिन्द से अन्ध मेरी आँख को ज्ञान रुनी सुरमा की सलाई से जिसने खोल दिया। उन श्रीगुरु को नमस्कार। 6– जिसका आश्रय पाकर टेढ़ा चन्द्र भी सर्व़ वन्दनीय बनता है उस ज्ञानमय नित्य और षंकररुपी गुरु को मैं वन्दन करता हूँ। दीक्षा:– श्री गुरुदेव की कृपा और षिश्य की श्रद्धा, इन दो पवित्र धाराओं का संगम ही दीक्षा है। गुरु का आत्मदान और षिश्य का आत्मसमर्पण, एक की कृपा और दूसरे की श्रद्धा के अतिरेक से ही सम्पन्न होती है।

दान और क्षय–यही दीक्षा का अर्थ हैं। ज्ञान, षक्ति और सिद्धि का दान एवं अज्ञान, पाप और दारिद्रय का क्षय, इसी का नाम दीक्षा हैै। दीक्षा एक दृश्टि से गुरु की और से आत्मदान, ज्ञानसंचार अथवा षक्तिपात है तो दुसरी दृश्टि से षिश्य में सुप्त ज्ञान और षक्तियों का उद्बोधन है। दीक्षा से षरीर की समस्त अषुद्धियाँ मिट जाती हैं और देहषुद्धि होने से देव–पूजा का अधिकार मिल जाता हैैै। अत: सभी साधकों के लिये दीक्षा अनिवार्य है। चाहे जन्मों की देर लगे, परन्तु जब तक दीक्षा नहीं होगी तब तक सिद्धि का मार्ग रुका ही रहेगा। सदगुरुकृपा के बिना साधना–राज्य में कोई व्यक्ति प्रवेष नहीं कर सकता। जिस विधि से सद्गुरु षिश्य को साधना–राज्य में प्रवेष करने का अधिकार देते हैै, उसी को दीक्षा कहते है। जप–तप सबका मूल दीक्षा हैै जहाँ कहीं जिस किसी आश्रम में भी दीक्षा का आश्रय करके ही रहना चाहिये।

दीक्षा के बिना सिद्धि नहीं मिलती, सद्गति नहीं प्राप्त होती। इसलिये हर उपाय से गुरु के द्वारा दीक्षित होना चाहिये। विधिपूर्वक दीक्षा होने से वह दीक्षा एक क्षण में लाखों उपपातक और करोड़ों महापातक जला डालती है। यह सत्य है कि वर्तमान समय में दीक्षा एक प्रथामात्र रह गयी है। न षिश्य में साधना की ओर प्रवृत्ति है और न गुरु में साधना की षक्ति। फिर दीक्षा का उज्जवल रहस्य लोगो की विशयोन्मुख बुद्धि में किस प्रकार आ सकता परन्तु इससे यह नहीं समझ लेना चाहिये कि अब कोई योग्य सद्गुरु है ही नहीं। जो अधिकारी पुरुश उनकी खोज करता हैै उसे वे मिलते है और वैसी ही दीक्षा सम्पन्न होती है जैसी कि प्राचीन समय में होती थी। लेकिन ध्यान रहे! आदर्ष गुरु मिलने के पूर्व अपने आपको आदर्ष षिश्य बनना पड़ता हैै। यहाँ एक प्रष्न उठता है कि क्या कोई नाम सद् गुरु से ही लेना आवष्यक है़? अथवा वह हम अपनी रुचि के अनुसार लें तब भी काम चल सकता हैै? सच पूछो तो भगवान् का नाम स्वयंसिद्ध है और परिपूर्ण है, उसे कहीं और से पूर्णता प्राप्त करनी पढ़ती हो ऐसा नहीं है।

सद्गुरु से लिया गया नाम और हमारी अपनी रुचि से लिया गया नाम, इनमें कोई फर्क नहीं हो सकता। फिर भी, सद्गुरु से लिये नाम की एक विषेशता है और वह यह कि उस नाम के पीछे सद्गुरु सत्ता रुप से होते हैै, और हमारे द्वारा नाम स्मरण होने के मामले में हमें उनकी बड़ी मदद होती है और इसीलिये, हमारे द्वारा हो रहा नामस्मरण उनकी सत्ता से ही हो रहा है, यह भान बना रहता है, और इसलिये मै नाम स्मरण करता हूँ इस प्रकार का अंहकार उत्पन्न होने की गुंजाइष नहीं रहती। अत: सद्गरु से नाम लेना आवष्यक है। वैसे देखो तो पहले तो सन्तों से भेंट होना ही कठिन होता हैै, और फिर भेंट हो भी जाये तो उन पर विष्वास बैठना तो और कठिन होता है। अत: नाम की साधना जारी रखना आवष्यक है, और तब, जैसे मिश्ररी की डली रख दो तो चींटियों को न्योता नहीं देना पड़ता है, व अपने–आप उसकी खोज करती चली आती है, क्योंकि वह उन्हें बहुत प्रिय होती है, ऐसे ही तुम मिश्ररी बनो तो सन्त–गुरु तुम्हारे पास दौडते चले आयेगें। मिश्ररी बनो यानी जो सन्तों को प्रिय है वह करो। सन्तों को क्या प्रिय है? भगवान् का अनुसन्धान और अखण्ड नाम–स्मरण, इसके सिवाय सन्तों को और कुछ भी प्रिय नहीं है।

अत: तुम नीति और धर्म के अनुसार आचरण करते हुए षुद्ध अन्त:करण रखते हुए भगवान् का अखण्ड स्मरण करते रहो। गुरु तुम्हें स्वयं ही खोजते आएंगे और अपनी कृपा की वर्शा करेंगे। जब तक किसी साधक को उचित गुरु की प्राप्ति होकर दीक्षा सम्पन्न न हो तब तक कुछ न करके समय नश्ट नहीं करना चाहिये। बल्कि षास्त्रों में बताए विकल्पानुसार ऐसे साधक को किसी षुभ समय में अर्थात् षुभ तिथि, वार, नक्ष़त्र योग एवं चन्द्रबल आदि देखकर कुला–कुल–चक्र के आधार पर मन्त्र का निर्णय कर उसे भोजपत्र पर लिखकर मन्त्र देवता के सम्मुख रख दे। पष्चात् उनकी विधिवत् पूजा–आराधना करे और इश्टदेव का ध्यान कर यह समझें कि यह मन्त्र उनसे प्राप्त हुआ है ऐसा भाव रखते हुए मन्त्र–विषेश का 108 बार जप करें। इस तरह दीक्षा हो जाती हैै तथा मन्त्र फलप्रद होता हैै।