मंगल दोष व भात पूजन :–
हिंदु संस्कृति में एवं हिंदु विवाह में मंगल दोष (मांगलिक) बहुत अधिक माना गया है। अर्थात् दाम्पत्य सुख की समस्या! दूसरे शब्दों में विवाह में देरी होना।
यदि जातक की पत्रिका में 1,4,7,8,12 स्थान(भाव) में मंगल ग्रह बैठा हो तो पत्रिका माँगलिक (मंगल दोष) होती है।
मंगल ग्रह एक उग्र ग्रह होता है। जो कि आग, बिजली, केमिकल, हथियार, क्रोध, रक्त, दुर्घटना आदि का स्वामी होता है। चूकि मंगल ग्रह की दृश्टि 4,7,8, होती है। अर्थात् मंगल अपने स्थान से 4,8, व 12 वे स्थान पर भी प्रभाव डालता है। मंगल अपने स्थान के अलावा 4,8,12 पर भी दृश्टि व प्रभाव डालता है। यह इस प्रकार समझा जा सकता है।
1. प्रथम भाव:– यदि मंगल प्रथम भाव में बैठा हो तो वह प्रथम भाव के साथ चतुर्थ भाव, सप्तम भाव, अष्टम भाव को भी प्रभाव करेगा।
प्रथम भाव जातक के व्यक्तित्व को प्रदर्शित करता है। अर्थात् जातक का स्वभाव बहुत क्रोधित होता हैै। चतुर्थ भाव जातक की सम्पित को प्रदर्षित करता है। अर्थात् सम्पत्ति से संबंधित समस्या, वाहन से संबंधित समस्या, बिजली से संबंधित समस्या, आग, केमिकल से दुर्घटना की सम्भावनाएं।
सप्तम भाव दाम्पत्य सुख, पार्टनरशीप आदि को प्रदर्शित करता है अर्थात् पति या पत्नि बहुत क्रोधित प्रवृत्ति का हो सकता है। पार्टनरशीप में घाटा होना आदि।
अष्टम भाव मृत्यु भय आदि को प्रदर्शित अर्थात् अपमृत्यु से भय होना।
2. चतुर्थ भाव:– यदि मंगल चतुर्थ भाव में बैठता है तो वह सप्तम, दशम, एकादश भाव को प्रभावित करता है। चूकि हम चतुर्थ व सप्तम भाव देख चुके है।
दशम भाव भविष्य, पिता, नींद प्रदर्शित करता है। अर्थात् करियर के लिए चिन्ता, करियर में बदलाव के लिए, अनिद्रा संबंधित समस्या पिता के स्वास्थ से संबंधित समस्या व पिता की शीघ्र मृत्यु हो जाना।
एकादश भाव आय को प्रदर्शित करता है। अर्थात् आय का रुकना व चोरी दुर्घटना का भय रहना।
3. सप्तम भाव:– यदि सप्तम भाव मंगल ग्रह बैठा हो तो वह दशम, प्रथम, द्वितीय का प्रभावित करता है। चूकि प्रथम, द्वितीय, भाव पहले बता दिया गया हैै। द्वितीय भाव जातक के शरीर एवं परिवार को प्रदर्शित करता है। सप्तम भाव से अष्टम होने से दाम्पत्य सुख व पार्टनरशीप को प्रभावित करता है। एवं मंगल की दृष्टि पारिवारिक मतभेद बना सकती है।
4. अष्टम भाव:– अष्टम भाव में मंगल स्थित होने से यह एकादश, द्वितीय व तृतीय भाव को प्रभावित करता है। चूकि एकादश व द्वितीय को पहले बता दिया गया है। तृतीय भाव जातक के भाई–बहन व जातक की वाणी, व उपलब्धियों को प्रदर्शित करता हैै। अत: मंगल की तृतीय भाव पर दृष्टि होने के कारण जातक को बोलने में कटु, वाचाल, स्पष्टवादी आदि बना सकता है। एवं असफलताऔ के बाद सफलता दिलाने वाला बनाता है।
5. द्वादश भाव:– द्वादश भाव में मंगल स्थिति होने से यहा तृतीय, षष्टम, सप्तम को प्रभावित करता है। द्वादश भाव जातक के व्यवहार अर्थात् मंगल होने से जातक को अव्यवहारिक बनाता है।
षष्टम भाव बीमारी, नौकर द्वारा चोरी, एवं सौतेले अंकल को प्रदर्शित करता है। षष्टम भाव पर दृष्टि होने से पेट की बीमारी, अत्यधिक चिंता, रक्त संबधित बीमारी का भय रहता है।
उस प्रकार प्रत्येक भाव में स्थित होने से व दूसरे भाव पर दृष्टि होने से निम्न प्रकार का प्रभाव व लाभ होता है।
21वी सदी में मंगल दोष का महत्व:–
1. मंगल विभिन्न प्रकार की समस्या से लडने की आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करता है।
2. मंगल किसी भी प्रकार की चुनौती से लडने के लिए आंतरिक शिक्षा प्रदान करता है।
3. मंगल जातक को बहुत प्रभावशाली व्यक्ति बनाता है। अर्थात् आलस्य से दूर व हर समय किसी भी कार्य में व्यस्त रहते हुऐ सजग रखता है।
4. मंगल जातक को अनुशासित, अच्छा प्रशासनिक, प्रापर्टी डीलर बनाता है। तथा कुशल राजनितीज्ञय व विशाल जनसमुह को प्रभावित करने की क्षमता प्रदान करता हैै।कि एक अच्छे लीडर की खूबिया होती है।
5. मंगल सर्जन, जनरल, एयर मार्शल, बिजनेस मेन, प्रधानमंत्री आदि के लिए एक उपहार स्वरुप प्रभाव करता है।
भात पूजन विधि एवं महत्व
मगल ग्रह की पूजन में भात पूजन का विशेष महत्व है इस पूजन में मंगल भगवान का पंचामृत अभिषेक कर रुद्राभिषेक किया जाता है, इसके पश्चात पके हुवे चावल में पंचामृत मिलाकर शिवपिण्ड पर चढाया जाता है और उसका षोडशोपचार पूजन किया जाता है। मंगल ग्रह का तत्व अग्नि है एवं इनकी क्रूर दृष्टि है। जन्म पत्रिका में लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम एवं द्वादश स्थान पर स्थित होने पर ये मंगल दोष निर्भित करते है। मंगल दोष का प्रभाव सबसे ज्यादा जातक के विवाह पक्ष पर पडता है। विवाह में विलम्ब का कारण अधिकतर कुण्डलियोें में मंगल दोष के कारण देखा गया है, विद्वानों के अनुसार दही चावल की प्रकृति शीतल होती है अत: मंगल ग्रह के भात पूजन का महत्व है।
मंगल ग्रह की उत्पत्ति रहस्य
स्कन्द पुराण के अनुसार किसी समय अंधक नामक दैत्य अवंतिका पूरी (उज्जैन) में राज्य करता था। उस दैत्य ने घोर तपस्या कर वरदान प्राप्त किया था कि अगर मेरे रक्त की बुन्दे पृथ्वी पर गिरे तो उससे अनेको दैत्य उत्पन्न हो। वरदान प्राप्त कर अंधकासुर ने सभी और आतंक मचाना शुरु कर दिया तब सभी लोग त्रस्त होकर भगवान शिव के पास गये भगवान आशुतोष ने उन्हे सांत्वना देते हुए अंधकासुर को युद्ध के लिये ललकारा। उन दोनों के बीच घमासान युद्ध हुआ। उस समय भगवान शिव के मस्तक से पसीने की बूँद पृथ्वी पर गिरी और पृथ्वी के गर्भ से मंगल ग्रह की उत्पत्ति हुई और उन्हे ब्राजी द्वारा उसी स्थान पर शिव पिण्ड के रुप में स्थापित किया गया और देवताओं एवं ब्रणों द्वारा पूजा गया। यह स्थान वर्तमान में मंगलनाथ नाम से पूरे भारत वर्ष में प्रसिद्ध है।
ज्योतिष में मंगल ग्रह की महत्ता
मंगल ग्रह का स्वरुप लाल वर्ण युक्त है इनकी चार भुजाएं है ये मेष एवं वृष्चिक राशि के स्वामी है। मंगल मकर राशि में उच्च के एवं कर्क राशि मेें नीच के होते है ये दक्षिण दिशा में दिग्बली होते हैैं। कर्क एवं सिंह लग्न में परम योगकारी ग्रह होते है जन्म कुण्डली में छोटे भाई एवं पराक्रम के कारक होते है। राजनीति, उच्चपद भूमिभवन का सुख, दाम्पत्य सुख सन्तान सुख, सन्तान सुख का विचार भी मंगल देव की स्थिति से किया जाता है मंगल ग्रह की कृपा प्राप्ति के लिए मंगल दान भी किया जाता है जिसमें मसूर की दाल, गुड, तांबा, मूंगा व लाल पुष्प लाल कपडे में बांध कर मंगल देव को अर्पण करने से मंगल ग्रह सम्बधित दोष पीढा से मुक्ति मिलती है एवं मंगल देवता की कृपा प्राप्ति होती है।
पितृ दोष
पितृ दोष अर्थात् किसी मनुष्य का परिवार न बढना व परिवार को निरंतर किसी प्रकार कि समस्या होना। अर्थात् जातक के व परिवार के पितृ देव को संतुष्ट करने के लिए नारायण बली पूजन की जाती है। जिसे पितृ दोश कहा जाता है। पूर्व पूर्वज से आर्शिवाद लेने व वंश को आगे बढाने के लिए भी नारायण बली पूजन का महत्व बताया गया है।